
बात किस साल की है, ये तो याद नहीं लेकिन वाजपेयी साहब प्रधानमंत्री थे तब। मैं पटना में पढ़ाई कर रहा था। हमें सिविल सर्विसेज़ परीक्षा की तैयारी के नाम पर ग्रुप डिस्कसन या स्टडी का बड़ा शगल था। कुछेक डिबेट मित्र बिक्रम सिंह के घर पर हुई थी।
एक बार हम संविधान के सेकुलर होने को लेकर अटक गए। सेकुलर अंग्रेज़ी का शब्द है। और, उस दिन के हमारे ग्रुप में मुझे ही अंग्रेज़ी का सबसे बड़ा जानकार समझा जा रहा था। आप समझ सकते हैं कि कितनी ही अंग्रेज़ी आती होगी हमें।
मैंने डिक्शनरी में पढ़े अर्थानुसार बता दिया कि सेकुलर का मतलब है कि जिसका धर्म से कोई लेना-देना न हो। एक कॉन्सेप्ट जो उन दिनों — और, शायद आज भी — दिमाग़ पर चढ़ा था वो भी बता दिया कि सेकुलर के लिए धर्मनिर्पेक्ष शब्द ठीक नहीं है।
वाजपेयी के सुझाए सर्व-धर्म-समभाव को भी मैंने अपने तर्क से नकारा कि सेकुलर की व्याख्या में धर्म आधार हो ही नहीं सकता है। मैंने उस कॉन्सेप्ट के आधार पर इहलौकिकता शब्द का प्रस्ताव रखा। यह कॉन्सेप्ट हिंदी के मेरे प्रोफ़ेसर (कॉलेज़ के नहीं, लेकिन गुरु थे और हैं) जावेद अख़्तर ख़ान के साथ बातचीत में निकलकर आया था।
इहलौकिकता का मतलब है इस लोक से संबंधित। यानी, सांस्थानिक धर्म यानी रिलीजन में आने वाले परलोक के कॉन्सेप्ट से बिल्कुल अलग।
लेकिन, यह कॉन्सेप्ट किसी बड़े विचारक का तो था नहीं, सो सुग्राह्य नहीं हुआ। मेरे दोस्तों को अटपटा लगा। अनसुना शब्द जिसके पीछे कोई विद्वान नहीं। वाजपेयी जैसा भी नहीं। स्कॉलर्स की दुनिया में वाजपेयी उतने ही बड़े विद्वान थे, जितने हिंदी फ़िल्मों के गानों के शौकीन, मेरे लिए ग़ज़ल के बादशाह पंकज उधास थे।
बड़ी बहस के बाद बिक्रम ने संविधान की हिंदी की प्रति निकाली। देखा तो पता चला कि संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिर्पेक्ष शब्द ही नहीं है। वहाँ तो पंथनिर्पेक्ष लिखा है। यानी, इंदिरा गाँधी के समय तक के भी जो राजनैतिक विद्वान थे वे रिलीजन को पंथ मानते थे, धर्म नहीं। फिर भी पता नहीं किस साजिश से या किस सामूहिक मूढ़ता में सेकुलर के लिए धर्मनिरपेक्ष शब्द चल पड़ा।
कुछ यही हाल ब्रह्मचर्य शब्द के साथ हुआ है।
ब्रह्मचर्य या ब्रह्मचारी शब्द का प्रयोग करते ही कई लोगों को सबसे पहले हनुमान की तस्वीर या मूर्ति याद आती है। ऐसा मेरा अनुमान है। बचपन से बताया गया कि हनुमान ब्रह्मचारी थे। बाल ब्रह्मचारी थे।
समस्या मेरे लिए वहाँ से खड़ी होती है जहाँ ब्रह्मचर्य को अविवाहित होने से जोड़ दिया जाता है। ब्रह्मचारी का मतलब ऐसा व्यक्ति, अनिवार्य रूप से पुरुष, जिसने विवाह न किया हो। इसका एक दूसरा हिस्सा हो गया कि इस व्यक्ति ने कभी भी किसी महिला से संसर्ग न किया हो।
ऊपर से बाल ब्रह्मचारी की अवधारणा। इसको मान लें तो इसका अर्थ ये भी हो जाता है कि बहुत से लोग या ज़्यादातर लोग बालकाल में ही विवाह करते थे या महिला से संसर्ग करते थे। तभी तो बाल ब्रह्मचारी होना ज़्यादा बड़ी बात बताई जाती रही।
मुझे पता नहीं ऐसा कब शुरू हुआ। लेकिन ब्रह्मचर्य का विवाह या महिला संसर्ग से संबंध इसके सेकुलर कांड से है।
ब्रह्म शब्द की अलग-अलग व्याख्या है लेकिन दो मुख्य बिंदु हैं इसमें। एक, सेल्फ या स्व या आत्म और दूसरा यूनीवर्सल सेल्फ या वैश्विक-स्व। चर्य यानी उस दिशा में आगे बढ़ना या उस रास्ते पर चलना।
कुछ लोगों ने इसे ईश्वर से भी जोड़कर देखा है। स्व हो या ईश, इसमें विवाहरहित और महिला संसर्गरहित होने की बात कहाँ से घुस-पैठ गई, समझ नहीं आता। ख़ासकर तब जब कि जिन्हें भी ईश्वर को अवतार या रूप कहा जाता है उनमें से लगभग सभी का विवाह हुआ और उनकी संतान भी हुई।
यही है ब्रह्मचर्य का सेकुलर कांड।
इसको थोड़ा और समझते हैं। पतंजलि का योगसूत्र से। यह उदाहरण मैं ढूँढ़-ढाँढ़कर लाया हूँ। ऐसा नहीं है कि मुछे पतंजलि के योगसूत्र की बहुत जानकारी है। उतनी ही है जितनी इतिहास की क़िताबों में लेखक बताते रहे हैं।
पतंजलि ने ब्रह्मचर्य को पाँच में से एक यम बताया है। यम माने नैतिक शपथ यानी वैसे मूल्य जो हमारे मन मे जिसे सकारात्मक विचार कहा जाता है उसे बनाने के लिए ज़रूरी हैं।
पतंजलि के पाँच यम थेः
अहिंसाः किसी कर्म या विचार जिससे किसी की हानि हो या हो सकती हो उसका त्याग। पतंजलि ने ख़ुद कहा कि अहिंसा अंदर और बाहर की शत्रुता ख़त्म करता है और योगी को अंदर-बाहर का समन्वय देता है।
सत्यः जो जैसा है वैसा ही समझना और व्यवहार में रखना, बिना प्रभावित हुए।
अस्तेयः किसी की कोई वस्तु या विचार का बिना अनुमति प्रयोग या संचय करना।
ब्रह्मचर्यः आप जानते ही हैं कि यह क्या है।
अपरिग्रहः किसी भी प्रकार का संचय नहीं, तन, मन या धन।
पतंजलि ने यमों को महाव्रत कहा था जो वर्ग, स्थान, समय और परिस्थिति की सीमाओं के अतिक्रमण में भी सार्वभौम रहते है। ये याद रखने की बात है।
उसी योगसूत्र में पतंजलि ने नियम बताए हैं। नियम यानी नित् किए जाने वाले यम। ये वैसे रूटीन हैं जो हमारी आदतों, व्यवहारों और कर्मों को तय करते हैं।
जो नियम गिनाए गए, वे हैः
शौच: सफाई और शुद्धि, मन, वचन और तन की।
संतोष: सत्य, तथ्य की बिना हर्ष-विषाद के स्वीकार्यता (कर्म के सिद्धांत के साथ इसका ख़ास मेल है)
तपस्: शाब्दिक अर्थ में गर्मी। लेकिन नियम में इसका अर्थ किसी काम को उसमें दक्षता हासिल करने के ध्येय से बार-बार करना, ऑस्टेरिटी यानी मितव्ययता इसका अटूट भाग है।
स्वाध्याय: जो भी मानसिक तौर पर ग्रहण करें उसकी पड़ताल करना, बेहतर समझ के लिए।
ईश्वरप्रणिधान: यह आख़िरी नियम है। यानी जब जीवन के बाक़ी नियम नियत रूप से पूरे हो जाए तो ईश्वर के प्राणि से संबंध का ध्यान करना चाहिए, विचार-विवेचन करना चाहिए।
पतंजलि विद्वान थे, उन्होंने ब्रह्मचर्य को नियम में यानी जीवन के रूटीन में नहीं डाला। उन्होंने इसे यम कहा। और, नियम में इसके विचार के लिए ईश्वरप्रणिधान की प्रस्तावना की।
अब हनुमान के प्रश्न पर लौटते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि हनुमान को सेलिबेट घोषित करने की ज़िद किसी ने कभी भी क्यों शुरू की। कई उद्धरण हैं जो हनुमान के विवाहित होने की बात बताते हैं।
हनुमान का विवाह
तेलंगाना के खम्मम में एक मंदिर है हनुमान का जहाँ उन्हें उनकी पत्नी के साथ दिखाया गया है। मंदिर कितना पुराना है मुझे पता नहीं। लेकिन, यहाँ हनुमान की पत्नी का नाम सुवर्चला बताया जाता है। जैसे राम-जानकी मंदिर होते हैं वैसे ही यहाँ इन्हें संयुक्त रूप से सुवर्चला अंजनेय कहा जाता है।
परासर संहिता में इस बात ज़िक्र है। कब का ग्रंथ है, यह शोध का विषय है। मुझे इतना पता है कि परासर नाम के एक ऋषि ने ऋग्वेद की कुछ ऋचाएँ लिखी है। परासर को मुनि वशिष्ठ का पोता कहा गया है। और, कृष्ण द्वैपायन यानी वेद व्यास का पिता।
परासर ने लिखा है कि सुवर्चला सूर्य की पुत्री थी। सुवर्चला को बारे में कहते हैं कि वे अयोनिजा थी। यानी, उनका जन्म योनिमार्ग से नहीं हुआ था। परासर ने लिखा कि सूर्य, जो हनुमान के गुरू थे, के कहने पर हनुमान और सुवर्चला ने विवाह किया। परासर ने तो उनके विवाह की तिथि भी बताई — ज्येष्ठ शुद्ध दशमी।
तुलसीदास के रामचरितमान से कई सौ साल पहले जैन ग्रंथों में राम की कथा लिखी गई है। एक ग्रंथ है पौमचरिय या पद्मचरित्। इसे कुछ लोग पहली जैन रचना भी मानते हैं, अभी तक सुरक्षित रहने के लिहाज से। यह प्राकृत में है। संस्कृत के बाद वाली भाषा। इसके लेखक का नाम विमलसूरी है। इसका काल चौथी सदी ईसा पूर्व से पहली सदी ईसा पूर्व के बीच बताया जाता है।
इसमें हनुमान को विवाहित बताया गया है। हनुमान ने लंकासुंदरी से विवाह किया था। उनकी पत्नी लंका के मुख्य रक्षक ब्रजमुख की बेटी थी।
किसी अन्य जैन ग्रंथ में हनुमान का विवाह राजकुमारी अनंगकुसुम से होने की बात कही गई है। अनंगकुसुम रावण की बहन चंद्रनखा और खरदूषण की बेटी थी। मज़ेदार बात यह है कि जैन विवरण में यह भी कहा गया है कि रावण ने अपनी एक भतीजी अथवा भगिनी का हाथ हनुमान के हाथ मे दिया था उनकी दूसरी पत्नी के रूप में।
यह संभव है कि जैन ग्रंथ हनुमान की छवि ख़राब करने के षड्यंत्र के तहत ऐसा कर रहे हों। लेकिन मैंने कभी किसी जगह पर जैनियों के ख़िलाफ़ हनुमान या राम भक्तों का आक्रमण नहीं पढ़ा, वह भी इस बात को लेकर कि हनुमान के बारे में अफ़वाह फैलाई।
लेकिन, जैन ग्रंथ जैसे कि पद्मचरित् राम के ख़िलाफ़ नहीं थे। राम को पद्म यानी कमल के समान बताया।
हनुमान के पुत्र
मकरध्वज के बारे में तो सभी को पता है। जन्म की कहानी अलग-अलग है लेकिन मकरध्वज की कहानी है। कभी मकरध्वज को रावण के भाई अहिराण के महल का मुख्य रक्षक बताया गया जब हनुमान राम और लक्षण की सहायता के लिए पाताल-लोक गए।
किसी अन्य कथा में मकरध्वज का जन्म हनुमान के पसीने की बूँद मछली द्वारा ग्रहण करने से होने की बात कही गई। हनुमान का यह पसीना लंका दहन के बाद अपनी पूँछ हिंद महासागर में बुझाते समय गिर गया था।
एक और वर्णन मिलता है। तुलसी की रचना से पहले के किसी रामायण में। इसमें हनुमान के पुत्र का नाम मच्चानु बताया गया है। मच्चानु की माँ का नाम सुवन्नामच्चा बताया गया। सुवन्नामच्चा रावण की बेटी थी।
अयोध्या के बाद हनुमान
भक्त मानते हैं कि हनुमान आज भी जीवित है। किसी ने कभी बताया था या कहीं पढ़ा था मैंने कि हनुमान अयोध्या से निकलने के बाद विचरते रहे और आख़िर में हिमालय पर्वतों में चले गए। वहाँ किसी गुफा में उन्होंने राम-विरह की वेदना में अपने नाखून से दीवारों को कुरेदकर राम की कथा लिखी। वो कथा जिसके गवाह स्वयं हनुमान थे।