उज़्बेकिस्तान को बाबर का देश कहा जा सकता है। यह मध्य एशिया में इस्लामी संस्कृति और सभ्यता का एक प्रमुख केंद्र रहा है। सोवियत के दिनों में यहाँ धर्म सरकारी तौर पर अमान्य था। लेकिन, मॉस्को से उज़्बेकिस्तान पर नज़र रखना मुश्किल तो रहा ही होगा। फिर 1990 का दशक आया। सोवियत टूटा। बाबर की धरती एक नया देश बन गई। लेकिन धर्म, यानी इस्लाम को वो रुतबा नहीं मिला जो एक 90% से अधिक आबादी वाले मुल्क में देखने को अमूमन मिलता है।
हालाँकि, हाल के वर्षों में इस्लाम और सरकार के संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे हैं। इस्लामी परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाली इस आबादी के लिए, 2016 में राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव के सत्ता में आने के बाद से एक नई उम्मीद की किरण जगी है।
उज़्बेकिस्तान, जहाँ 90% से अधिक आबादी मुस्लिम है, ने अपने स्वतंत्रता के बाद के इतिहास में इस्लामी प्रथाओं पर कड़े प्रतिबंध देखे हैं। यह एक ऐसा दौर था जब इस्लामी प्रतीकों के प्रति सरकार का रुख काफी कठोर था। 1991 में सोवियत संघ से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, उज़्बेकिस्तान की सरकार ने इस्लामी प्रतीकों और प्रथाओं पर सख्त नियंत्रण बनाए रखा। इस नीति का उद्देश्य उग्रवादी इस्लामी आंदोलनों के उदय को रोकना था।
सरकार ने सार्वजनिक स्थलों पर हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था, और पुरुषों को दाढ़ी रखने से रोका गया था। इस आदेश का पालन सख्ती से करवाया जाता था, जहाँ हिजाब पहनने वाली महिलाओं को रोकथाम केंद्रों पर ले जाया जाता था और उन्हें कठोर चेतावनी दी जाती थी। पुरुषों को जबरन उनकी दाढ़ी कटवाने पर मजबूर किया जाता था।
धार्मिक स्वतंत्रता पर लगाए गए ये प्रतिबंध इतने सख्त थे कि मस्जिदों में अज़ान देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था, और नाबालिग लड़कों को सामूहिक नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं थी। इस्लामी शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों पर भी कड़ी निगरानी रखी जाती थी।
हालाँकि, 2016 में राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव के सत्ता में आने के बाद इस्लामिक प्रथाओं पर लगे इन प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील दी गई। उनके नेतृत्व में, उज़्बेकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता के प्रति सरकार के रुख में बदलाव आया। मस्जिदों में अज़ान देने की अनुमति फिर से दी गई, और नाबालिग लड़कों को सामूहिक नमाज़ पढ़ने की अनुमति मिल गई।
साल 2018 में, हज यात्रा के लिए इच्छुक तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ाई गई और हज के खर्च को कम किया गया। ये सभी कदम इस दिशा में थे कि धार्मिक स्वतंत्रता को बढ़ावा मिले और उज़्बेकिस्तान की मुस्लिम आबादी को उनकी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने की स्वतंत्रता मिले।
साल 2021 में, उज़्बेक सरकार ने “धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संगठनों पर क़ानून” का नया संस्करण अपनाकर इन रियायतों को वैधानिक रूप दिया। इस नए क़ानून ने सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब और अन्य धार्मिक कपड़े पहनने पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया। साथ ही, धार्मिक संगठनों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल बना दिया गया, जिससे अब केवल अदालतें ही उनकी गतिविधियों को निलंबित कर सकती हैं।
लेकिन, इस सुधारवादी दृष्टिकोण के बावजूद, इस्लामिक प्रतीकों और धार्मिक स्वतंत्रता पर पूरी तरह से स्वतंत्रता नहीं मिली है। सरकारी संस्थानों में हिजाब पहनने पर अभी भी आंतरिक नियमों के माध्यम से नियंत्रण रखा गया है। उदाहरण के लिए, सामान्य शिक्षा स्कूलों के आंतरिक नियमों के अनुसार, स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति नहीं है। ताशकंद क्षेत्र के स्कूलों में, शिक्षकों को हर सुबह स्कूलों के बाहर खड़े होकर छात्राओं से उनके सिर के स्कार्फ उतारने की माँग करने का निर्देश दिया गया है।
इसके अलावा, उज़्बेकिस्तान में इस्लामी प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया में 2019 से फिर से कड़ा रुख अपनाया गया है। अक्टूबर 2019 में ख़बरें आईं कि उज़्बेकिस्तान की सरकार ने बाज़ारों पर छापे मारने शुरू कर दिए और लंबी दाढ़ी वाले युवकों को पकड़ कर उनकी दाढ़ी जबरन कटवाई जा रही हैं।
कहने का उज़्बेकिस्तान में इस्लाम और सरकार के बीच संबंध अभी भी जटिल हैं। राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव के तहत दी गई रियायतों के बावजूद, इस्लामिक प्रतीकों को लेकर सरकार का रुख समय-समय पर बदलता रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अभी भी एक प्रकार की अनिश्चितता बनी हुई है, और सरकार द्वारा इस पर नियंत्रण की प्रक्रिया जारी है।
