सबसे पहले यह समझते हैं कि शिव के बारे में हम निश्चित तौर पर क्या जानते हैं।
- शिव और शक्ति दो आर्य-पूर्व देवता हैं।
- शिव हिमालय-पार तिब्बत के मानसरोवर में रहते हैं।
- शिव के जन्म को लेकर कोई निश्चित जानकारी नहीं है।
- शिव क्रोध में रहते हैं।
- शिव का साधना से गहरा संबंध है।
- शिव आदि योगी हैं।
अब शिव से जुड़ी कुछ ऐसी बातें जिनके बारे हम कम जानते हैं।
शिव शब्द का अर्थ क्या है? इसको लेकर दो मुख्य मत हैं। एक, शिव का शाब्दिक अर्थ है वह जो नहीं है। दो, जैवशक्ति जो जीवन को मृत्यु/मृत से अलग रखती है।
इसी से जुड़ा एक पौराणिक कथन भी है। शक्ति के बिना शिव शव है। इसका सीधा अर्थ यह है कि शिव निरंतर है। हमेशा रहता है। शिव जब शक्ति के साथ हो तो जीवन है। दूसरा, शक्ति बिना शिव के दिशाहीन है। अकेले शक्ति जीवन नहीं दे सकती है। तीसरा, शिव शव में भी होता है। लेकिन शक्तिमान नहीं होता है, गतिमान नहीं है।
समझने के लिए ऐसा भी कह सकते हैं कि शिव ऊर्जा है, स्थितिक ऊर्जा (पोटेंशियल एनर्जी ऑफ़ लाइफ़)। शक्ति इसे गतिक ऊर्जा (काइनेटिक एनर्जी ऑफ़ लाइफ़) बना देती है। हम इसको जीवित होना समझते हैं।
शिव शब्द की उत्पत्ति/का संबंध आर्य-पूर्व शब्द चिवन से है।
यह शब्द चिवन या शिवन के तौर पर आज भी कुछ द्रविड़ भाषाओं, बोलियों में है। चिवन शब्द का अर्थ लाल रंग से है। अंदाज़ा है कि इसका पुराना अर्थ आंतरिक शक्ति से था। ख़ून को अमूमन शक्ति का प्रतीक माना जाता रहा है। संभव है कि इसलिए चिवन अब लाल रंग के लिए प्रयोग किया जाने लगा।
चिवन और तिब्बत शिव को ची शब्द से जोड़ता है। इस पर बहुत कम लोगों का ध्यान गया है। लेकिन यह शिव को समझने (डिसकवरी ऑफ़ शिव) के लिए बहुत ज़रूरी है।
ची आज चीन के आध्यामिक जीवन से गुत्थमगुत्थ है। ची का अर्थ उस ऊर्जा से है जिसे जैवशक्ति (वाइटल फ़ोर्स) कहते हैं। वहाँ की आध्यात्मिक अवधारणाओं के मुताबिक़ हर वस्तु में ची है। लेकिन जब ची का प्रवाह नहीं होता है तो वह निर्जीव है। और, जब ची का प्रवाह होता है तो जीवन। यहाँ ची जैवशक्ति है और वह शक्ति से मिल गया है। संस्कृत-आधारित अवधारणा में इसे प्राण कहा गया है।
अब वह क्रिटिकल लिंक या क्लू। भारत-तिब्बत-चीन के इतिहास में अनेकों ऐसे शब्द हैं जहाँ भारत का श वहाँ च हो गया है। पूर्वोत्तर भारत – जिसका तिब्बत के साथ बहुत गहरा संबंध रहा है — में भी इस तरह के लिंकेज मिलते हैं। मसलन, चाय का शाय हो जाना।
ची को साधना पड़ता है। ची को साधने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। शिव को आदि योगी मानते हैं। साधना में सबसे पहले अपने चित्त को साधते हैं। भारतीय परंपराओं में चित्त को शिव का दूसरा रूप मानते हैं। यानी, योग-ध्यान में चित्त माने शिव को साधते हैं।
चित्त चंचल होता है। बहिर्गमन स्वाभावी है। उसको पहले-पहल बाँधकर अंतर्मुखी करना होता है। चित्त पकड़ में नहीं आता है। भागना चाहता है। क़ाबू में करना मुश्किल होता है। शिव की तरह। शिव को ऋग्वेद के काल से ही क्रोधित समझा गया है। शिव को शांत करना – यानी चित्त को अंतर्मुखी करना – आवश्यक समझा गया है।
अशांत शिव सृष्टि का नाश करता है। बेक़ाबू चित्त उसे धारण करने वाले जीवन के लिए विनाशकारी हो सकता है। इसके लिए हम अंतर्मुखी होते हैं, यानी अंदर झाँकते हैं, देखते हैं। अपनी तीसरी आँख से। इसलिए ही शिव को तीसरी आँख से जोड़ा जाता है।
क्या ये सारे अंतर्बद्ध सूत्र महज संयोग है? क्या ये सूत्रों में उलझे, फँसे और ग़ुम हो चुके अर्थ नहीं है?
शिव कहीं बाहर नहीं है। शिव कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है। शिव वस्तुतः कोई व्यक्ति है ही नहीँ। यह हमारे अंदर का जैव-स्रोत है जो प्राण-शक्ति से मिलकर हमें वह ऊर्जा देता है जिसे हम स्पिरिट कहते हैं।
तो, आज इस महाशिवरात्रि को अपने अंदर के शिव को पहचानें और शक्ति से इसके मेल को महामेल बनाएँ।
यहाँ कुछ ऐतिहासिक तस्वीरें आपसे साझा की जा रही हैं। शिव, उनके इतिहास और परंपरा पर विचार के लिए:


शिव आराधना की परंपरा के सूत्र भारत के बाहर भी होने के संकेत मिलते हैं
(लेख 2020 का है)
