सोशल मीडिया कभी-कभी बड़े ज्ञान की बात बता जाता है। अभी कुछ दिन पहले कहीं एक वीडियो देखने को मिल गया। इसमें एक सज्जन, जो शायद 55 के आसपास की उम्र में होंगे यानी भी युवा हैं, उन्होंने एक अवधारणा माने कॉन्सेप्ट से मेरा परिचय करवाया। प्रोटागोरसेज़ पैराडॉक्स।
पैराडॉक्स का मतलब होता है विरोधाभास। और, प्रोटागोरस प्राचीन ग्रीस, जिसे भारत में यूनान के नाम से भी जानते हैं, के एक बड़े ज्ञानी, दार्शनिक और टीचर थे। एक ऐसा मसला आया उनके और उनके एक छात्र के बीच जो इतिहास अपनी याद छोड़ गया प्रोटागोरसेज़ पैराडॉक्स के रूप में।
इसे पैराडॉक्स ऑफ़ द कोर्ट भी कहते हैं। यही इसका अधिक प्रचलित रूप भी है। कोर्ट का विरोधाभास। मैं प्रोटागोरस का विरोधाभास शब्दावली को ज़्यादा पसंद करता हूँ क्योंकि यह हमें असली कहानी बताता है।
हुआ यूँ था कि प्रोटागोरस का एक स्टूडेंट था, यूथेलस। प्रोटागोरस जैसे शिक्षकों को ग्रीस में सोफिस्ट कहते थे। सोफिस्ट ज्ञानी लोग होते थे जो एक शहर से दूसरे शहर जाते रहते थे और अमीर घरानों के बच्चों को नीति-न्याय, राजनीति, गणित, विज्ञान जैसे विषयों में पारंगत करने की गारंटी लेते थे। इसके बदले बहुत सारा धन लेते थे। यानी, ज्ञान बेचने वाले शुरुआती व्यापारी थे।
यह बात बड़ी दिलचस्प है कि प्राचीन ग्रीस में प्लेटो जैसे दार्शनिक-शिक्षक ने पैसे लेकर ज्ञान देने वालों की आलोचना की है। उनकी मान्यता थी कि ग्रीस में पहले के बुद्धिमान लोग ज्ञान देने के बदले धन नहीं लेते थे और ऐसा करना अनैतिक है।
मुझे अभी तक कहीं ऐसा पढ़ने को नहीं मिला है कि “ज्ञान के बदले धन” की परंपरा ग्रीस में भारत से पहुँची थी या नहीं। भारत में इसे ही गुरुदक्षिणा कहते थे। और, गुरु का इसपर पूरा अधिकार होता है। गुरू ज़बरन गुरुदक्षिणा लेने को स्वतंत्र थे। कुछ भी माँगा जा सकता था। वैसे भी, गुरु या अन्य प्रयोजन के लिए दक्षिणा की कहानियाँ भरी परी है भारत के लौकिक और पौराणिक साहित्य में। रावण ने दक्षिणा में लंका माँग लिया था। सपने में दक्षिणा देकर राजा हरिश्चंद्र बेघर हो गए थे।
यह सोच इतनी मजबूत थी कि गुरु द्रोण ने जब एकलव्य का अँगूठा माँग लिया तो किसी ने उन्हें अनैतिक काम करने का दोषी नहीं ठहराया। बाद के टीकाकारों ने एकलव्य और उनके बलिदान को अमर किया। प्राचीन ग्रीस और भारत में व्यापार और सांस्कृतिक संबंध गहरे थे। मुमकिन है कि भारत से यह ज्ञान-व्यापार ग्रीस पहुँचा हो जिसे प्लेटो कल्चरल पॉल्यूशन (आज की शब्दावली में) मानते थे।
प्रोटागोरस का नाम पहले सोफिस्ट की तरह लिया जाता है जिसने पैसे लेकर राजनीतिक-नैतिक-राजनयिक-गणित-विज्ञान कार्यव्यापार का प्रशिक्षण दिया। अमीर लोगों के बच्चों के लिए ऐसी ट्रेनिंग से राजशाही नौकरियों में जाना आसान हो जाता था। ऐडमिनिस्टेटिव क्वालिफ़िकेशन होता था यह ज्ञान। ग़रीब परिवारों के बच्चे इस ज्ञान से वंचित रहते थे क्योंकि उनके पास गुरुदक्षिणा का सामर्थ्य नहीं होता था।
लेकिन प्रोटागोरस ने एक ऐसा स्टूडेंट स्वीकार किया जो कामगारों के बेटा था। प्रोटागोरस ने यूथेलस के साथ समझौता किया कि वह उसे एक पारंगत वकील बना देगा। यूथेलस से शर्त रखी कि वह यदि अपना पहला केस जीत जाता है तो उसे गुरुदक्षिणा देनी होगी। चूँकि प्रोटागोरस आश्वस्त था कि उसका सिखाया लड़का केस जीतेगा ही, उसने यूथेलस को ट्रेन किया।
क़ानून और तर्कशास्त्र में पारंगत होकर यूथेलस प्रोटागोरस की क्लास से निकल आया लेकिन उसने केस लड़ने से मना कर दिया। लोग उसके बारे में जानने लगे थे कि वह एक ज़बरदस्त वकील है लेकिन उसके पास केस लेकर आने वाले हर व्यक्ति को यूथेलस मना करने लगा। बात धीरे-धीरे प्रोटागोरस तक पहुँची। उसे पहले से बेचैनी थी कि उसकी गुरुदक्षिणा नहीं आ रही है जो मिल जानी चाहिए थी।
कुछ वक़्त बाद प्रोटागोरस का धैर्य जवाब दे गया। उसने अपने शिष्य यूथेलस पर मुक़दमा किया। यह एक बड़ा ही शातिर मूव था। यूथेलस को अब मुक़दमा लड़ना ही होता। और, यह उसका पहला मुक़दमा होता। मुक़दमे में प्रोटागोरस ने दलील दी कि “अगर मैं यह मुक़दमा जीत जाता हूँ तो यूथेलस को मेरी गुरुदक्षिणा देनी होगी क्योंकि अदालत ने मेरी फ़ीस के अधिकार को वैध मान लिया होगा। अगर मैं केस हार गया तो भी यूथेलस को मेरी फ़ीस देनी होगी क्योंकि हमारे समझौते के मुताबिक़ पहला केस जीतने की सूरत में उसे ऐसा करना था।”
यूथेलस ने इस दलील को ऐसे पलटा कि एक अनसुलझा विरोधाभास पैदा हो गया। यूथेलस ने दलील दी कि “मैं किसी भी सूरत में फ़ीस नहीं दूँगा। अगर मैं केस जीत गया तो इसका मतलब है कि प्रोटागोरस से किया समझौता अवैध है और फिर मैं गुरुदक्षिणा देने को बाध्य नहीं हूँ। अगर मैं केस हार गया तो प्रोटागोरस से किया गया समझौता वैध होगा लेकिन तब मैं अपना पहला केस हार चुका होउँगा और गुरुदक्षिणा देने की बाध्यता से मुक्त हो चुका होउँगा।”
यही है वह प्रोटागोरसेज़ पैराडॉक्स, अदालत का विरोधाभास। है न मज़ेदार? केस अनसुलझा है। दोनों के बीच आगे क्या हुआ, मुझे पता नहीं। जानने में दिलचस्पी भी नहीं। आपको पता हो तो कमेंट में बताइए।
